Thursday, June 4, 2020




     
Purnbhram Kabir Saheb ji

‘‘बिठल भगवान की मूर्ति को दूध पिलाना’’


भक्त नामदेव जी के माता-पिता जी बिठल {श्री विष्णु जी जो एक ईंट पर खड़े हुए की पत्थर या पीतल की मूर्ति बनाई जाती है} के परम भक्त थे।
‘‘भगवान श्री विष्णु उर्फ श्री कृष्ण जी का बिठल नाम कैसे पड़ा?
एक छोटे-से गाँव में भक्त पुण्डलिक रहता था। वह भगवान श्री कृष्ण का परम भक्त था। पूर्व जन्म की भक्ति-शक्ति के कारण पुण्यात्माऐं बचपन से ही अनोखे कार्य करते हैं। एक दिन भक्त पुण्डलिक जी अपने पिता के चरण दबा रहा था। उनके पिता जी सोए ही थे। उसकी माता जी अपने पति पर हाथ से पंखे से हवा कर रही थी। उसी समय भगवान श्री कृष्ण जी उनके द्वार पर आ खड़े हुए और कहा कि हे पुण्डलिक! मैं तुम्हारे घर अतिथि बनकर ठहरना चाहता हूँ। भक्त पुण्डलिक ने धीरे से कहा कि ऊँची आवाज में मत बोलो, मेरे पिता जी को अभी-अभी नींद आई है। आप यहीं पर उस ईंट (ठतपबा) पर खड़े हो जाओ, आवाज मत करना। प्रतिक्षा करो। भक्त अपने पिता जी के चरणों को दबाता रहा। पैर दबाने में लीन हो गया। भगवान श्री कृष्ण उसके भोलेपन तथा सच्चे मन से किए आग्रह से प्रसन्न होकर अपने पैरों को साथ-साथ करके ईंट के ऊपर खड़े हो गए। दोनों हाथ कमर पर रख लिए। कुछ देर बाद भक्त पुण्डलिक ने ईंट पर खड़े श्री कृष्ण की ओर देखा और कहा कि आप कुछ देर ओर ऐसे ही खड़े रहें और इंतजार करें। उसके शुद्ध हृदय और भोले भाव से भगवान श्री कृष्ण प्रसन्न हुए। जब उसके पिता जगे तो पिता से कहा कि देखो! भगवान खड़े हैं। पहले तो केवल अकेले को दिखाई दे रहे थे, फिर अपने माता-पिता को भी दर्शन कराए। भगवान आशीर्वाद देकर चले गए। उनकी वह ईंट पर खड़ा होने वाली मूर्ति महाराष्ट्र में बहुत पूज्य है। इसको बिठल (ईंट पर खड़ा भगवान) के नाम से जाना जाने लगा। उस गाँव का नाम पुंडलिकपुर पड़ा। बाद में अपभ्रंस होकर पुण्डरपुर प्रसिद्ध हुआ।




"God kabir ji"




‘‘पत्थर को दूध पिलाना’’
नामदेव द्वारा बिठल भगवान की पत्थर की मूर्ति को दूध पिलाने का वर्णनः- नामदेव जी के माता-पिता भगवान बिठल की पत्थर की मूर्ति की पूजा करते थे। घर पर एक अलमारी में मूर्ति रखी थी। प्रतिदिन मूर्ति को दूध का भोग लगाया जाता था। एक कटोरे में दूध गर्म करके मीठा मिलाकर पीने योग्य ठण्डा करके कुछ देर मूर्ति के सामने रख देते थे। आगे पर्दा कर देते थे जो अलमारी पर लगा रखा था। कुछ देर पश्चात् उसे उठाकर अन्य दूध में डालकर प्रसाद बनाकर सब पीते थे।
नामदेव जी केवल 12 वर्ष के बच्चे थे। एक दिन माता-पिता को किसी कार्यवश दूर अन्य गाँव जाना पड़ा। अपने पुत्र नामदेव से कहा कि पुत्र! हम एक सप्ताह के लिए अन्य गाँव में जा रहे हैं। आप घर पर रहना। पहले बिठल जी को दूध का भोग लगाना, फिर बाद में भोजन खाना। ऐसा नहीं किया तो भगवान बिठल नाराज हो जाऐंगे और अपने को शॉप दे देंगे। अपना अहित हो जाएगा। यह बात माता-पिता ने नामदेव से जोर देकर और कई बार दोहराई और यात्रा पर चले गए। नामदेव जी ने सुबह उठकर स्नान करके, स्वच्छ वस्त्र पहनकर दूध का कटोरा भरकर भगवान की मूर्ति के सामने रख दिया और दूध पीने की प्रार्थना की, परंतु मूर्ति ने दूध नहीं पीया। भक्त ने भी भोजन तक नहीं खाया। तीन दिन बीत गए। प्रतिदिन इसी प्रकार दूध मूर्ति के आगे रखते और विनय करते कि हे बिठल भगवान!
दूध पी लो। आज आपका सेवादार मर जाएगा क्योंकि और अधिक भूख सहन करना मेरे वश में नहीं है। माता-पिता नाराज होंगे। भगवान मेरी गलती क्षमा करो। मुझसे अवश्य कोई गलती हुई है। जिस कारण से आप दूध नहीं पी रहे। माता-पिता जी से तो आप प्रतिदिन भोग लगाते थे। नामदेव जी को ज्ञान नहीं था कि माता-पिता कुछ देर दूध रखकर भरा कटोरा उठाकर अन्य दूध में डालते थे। वह तो यही मानता था कि बिठल जी प्रतिदिन दूध पीते थे। चौथे दिन बेहाल बालक ने दूध गर्म किया और दूध मूर्ति के सामने रखा और कमजोरी के कारण चक्कर खाकर गिर गया। फिर बैठे-बैठे अर्जी लगाने लगा तो उसी समय मूर्ति के हाथ आगे बढ़े और कटोरा उठाया। सब दूध पी लिया। नामदेव जी की खुशी का कोई ठिकाना नहीं था। फिर स्वयं भी खाना खाया, दूध पीया। फिर तो प्रतिदिन बिठल भगवान जी दूध पीने लगे।


Jagat Guru Rampal ji



सात-आठ दिन पश्चात् नामदेव के माता-पिता लौटे तो सर्वप्रथम पूछा कि क्या बिठल जी को दूध का भोग लगाया? नामदेव ने कहा कि माता-पिता जी! भगवान ने तीन दिन तो दूध नहीं पीया। मेरे से पता नहीं क्या गलती हुई। मैंने भी खाना नहीं खाया। चौथे दिन भगवान ने मेरी गलती क्षमा की, तब सुबह दूध पीया। तब मैंने भी खाना खाया, दूध पीया।
माता-पिता को लगा कि बालक झूठ बोल रहा है। इसीलिए कह रहा है कि चौथे दिन दूध पीया। मूर्ति दूध कैसे पी सकती है? माता-पिता ने कहा सच-सच बता बेटा, नहीं तो तुझे पाप लगेगा। बिठल भगवान जी ने वास्तव में दूध पीया है। नामदेव जी ने कहा, माता-पिता वास्तव में सत्य कह रहा हूँ। पिताजी ने कहा कि कल सुबह हमारे सामने दूध पिलाना। अगले दिन नामदेव जी ने बिठल भगवान की पत्थर की मूर्ति के सामने दूध का कटोरा रखा। उसी समय मूर्ति के हाथ आगे बढ़े, कटोरा उठाया और सारा दूध पी गए। माता-पिता तो पागल से हो गये। गली में जाकर कहने लगे कि नामदेव ने बिठल भगवान की मूर्ति को सचमुच दूध पिला दिया। यह बात सारे गाँव में आग की तरह फैल गई, परंतु किसी को विश्वास नहीं हो रहा था। बात पंचों के पास पहुँच गई कि नामदेव का पिता झूठ कह रहा है कि मेरे पुत्र नामदेव ने पत्थर की मूर्ति को दूध पिला दिया। पंचायत हुई। नामदेव तथा उसके पिता को पंचायत में बुलाया गया और कहा कि क्या यह सच है कि नामदेव ने बिठल भगवान की मूर्ति को दूध पिलाया था। पिता ने कहा कि हाँ! हमारे सामने पिलाया था। पंचों ने कहा कि यह भगवान बिठल जी की मूर्ति रखी है। यह दूध का कटोरा रखा है। हमारे सामने नामदेव दूध पिलाए तो मानेंगे अन्यथा आपको सपरिवार गाँव छोड़कर जाना होगा। नामदेव जी ने कटोरा उठाया और भगवान बिठल जी की मूर्ति के सामने किया। उसी समय कटोरा बिठल जी ने हाथों में पकड़ा और सब दूध पी गया। पंचायत के व्यक्ति तथा दर्शक हैरान रह गए। इस प्रकार नामदेव जी की पूर्व जन्म की भक्ति की शक्ति से परमेश्वर ने चमत्कार किए।

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Sant Rampal ji saheb

Wednesday, June 3, 2020

           
'Saint Rampal ji saheb'






।।सत साहेब।।
’’सुमिरन के अंग का सरलार्थ‘‘
(अथ सुमिरन का अंग)
 शब्दार्थ :- अथ = प्रारम्भ, अविगत = जिस परमेश्वर की गति यानि सामर्थ्य कोई नहीं
जानता। जिसको गीता अध्याय 8 श्लोक 3 में परम अक्षर ब्रह्म कहा है तथा अध्याय 8 के
ही श्लोक 8ए 9ए 10 में परम दिव्य पुरूष तथा श्लोक 20 से 22 में अविनाशी अव्यक्त कहा
है। गीता अध्याय 18 श्लोक 61.62ए 66 में गीता ज्ञान दाता ने जिस परमेश्वर की शरण में
जाने के लिए कहा है, उसी को संत गरीबदास जी ने अविगत राम कहा है।
 राम की परिभाषा :- राम कहो, प्रभु, स्वामी, अल्लाह, भगवान, ईश, परमात्मा या साहब
(साहिब) कहो। ये परमात्मा का बोध कराने वाले नाम हैं।
उदाहरण के लिए :- जैसे तहसीलदार साहब अपने कार्य क्षेत्रा का स्वामी है, मालिक
है, प्रभु है।
उपायुक्त साहब :- यह अपने जिले में साहब, स्वामी, प्रभु, मालिक है।
आयुक्त साहब :- यह कई जिलों का साहब, स्वामी, प्रभु, मालिक है।
प्रान्त का मंत्रा भी साहब है, स्वामी, प्रभु है। मुख्यमंत्रा भी साहब (राम, प्रभु, स्वामी)
है। केन्द्र सरकार का मंत्रा भी साहब (राम, प्रभु, स्वामी) है।
देश के प्रधानमंत्रा जी भी साहब (राम, प्रभु, स्वामी) हैं।
देश के राष्ट्रपति जी भी साहब (स्वामी, राम, प्रभु)र्हिं।
परंतु इन सबकी अपनी-अपनी सीमाऐं हैं। अपने-अपने कार्यक्षेत्रा के सब ही प्रभु हैं,
परंतु वास्तव में समर्थ शक्ति राष्ट्रपति जी हैं। उनके पश्चात् प्रधानमंत्रा जी समर्थ शक्ति हैं।
पूर्ण साहब हैं।
इस सुमरण के अंग में वाणी नं. 15.16 में कहा है कि मूल कमल में राम है यानि गणेश
जी हैं। यह भी स्वामी हैं। राम हैं यानि देव हैं। (स्वाद कमल में राम) ब्रह्मा-सावित्रा भी प्रभु
हैं। (नाभि कमल में राम) विष्णु-लक्ष्मी भी प्रभु हैं। (हृदय कमल विश्राम) हृदय कमल में
शिव-पार्वती भी प्रभु (राम) हैं।(15)
(कण्ठ कमल में राम है) देवी दुर्गा भी राम है, मालिक-स्वामी है। (त्रिकुटी कमल में
राम) सतगुरू रूप में परमेश्वर त्रिकुटी में विराजमान हैं। वे उस स्थान पर सतगुरू रूप में
अपने कार्य के स्वामी (राम-प्रभु) हैं। (संहस कमल दल राम है) काल-निरंजन भी अपने 21
ब्रह्मण्डों का राम (स्वामी-प्रभु) है जो संहस्र कमल दल में अव्यक्त रूप में बैठा है। (सुनि
बस्ती सब ठाम) सब स्थानों (लोकों) पर जिसकी सत्ता है, वह भी राम (स्वामी, प्रभु) है। वाणी
नं. 17 में कहा है कि वास्तव में समर्थ राम है :-
अचल अभंगी राम है, गलताना दम लीन। सुरति निरति के अंतरे बाजै अनहद बीन।।
अचल (स्थाई) अभंगी (अविनाशी) जो कभी भंग यानि नष्ट नहीं होता, वह समर्थ राम है।
सुमरण का अर्थ है परमात्मा के सत मंत्रा का जाप करना। जैसे कबीर परमेश्वर जी

Satguru Rampal ji
ने कहा है कि :-
सारशब्द का सुमरण करहीं, सो हंसा भवसागर तरहीं।
सुमरण का बल ऐसा भाई। कालही जीत लोक ले जाई।।
नाम सुमरले सुकर्म करले कौन जाने कल की, खबर नहीं पल की।
श्वांस-उश्वांस में नाम जपो, बिरथा श्वांस न खोय। ना बेरा इस श्वांस का, आवन हो के ना होय।।
कहता हूँ कही जात हूँ, सुनता है सब कोय। सुमरण से भला होयेगा, नातर भला ना होय।।
सुमरण मार्ग सहज का, सतगुरू दिया बताय। श्वांस-उश्वांस जो सुमरता, एक दिन मिलसी आय।।
 राग आसावरी से शब्द नं. 63ए66 तथा 75 :-
नर सुनि रे मूढ गंवारा। राम भजन ततसारा।।टेक।। राम भजन बिन बैल बनैगा, शूकर श्वान
शरीरं। कउवा खर की देह धरैगा, मिटै न याह तकसीरं।।1।। कीट पतंग भवंग होत हैं, गीदड़
जंबक जूंनी। बिना भजन जड़ बिरछ कीजिये, पद बिन काया सूंनी।।2।। भक्ति बिना नर खर एकै
हैं, जिनि हरि पद नहीं जान्या। पारब्रह्म की परख नहीं रे, पूजि मूये पाषानां।।3।। थावर जंगम में
जगदीशं, व्यापक पूरन ब्रह्म बिनांनी। निरालंब न्यारा नहीं दरसै, भुगतैं चार्यौं खांनी।।4।। तोल न
मोल उजन नहीं आवै, असथरि आनंद रूपं। घटमठ महतत सेती न्यारा, सोहं सति सरूपं।।5।।
बादल छांह ओस का पानी, तेरा यौह उनमाना। हाटि पटण क्रितम सब झूठा, रिंचक सुख
लिपटांना।।6।। नराकार निरभै निरबांनी, सुरति निरति निरतावै। आत्मराम अतीत पुरुष कूं,
गरीबदास यौं पावै।।7।।।63।। भजन करौ उस रब का, जो दाता है कुल सब का।।टेक।।
बिनां भजन भै मिटै न जम का, समझि बूझि रे भाई। सतगुरु नाम दान जिनि दीन्हा, याह संतौं
ठहराई।।1।। सतकबीर नाम कर्ता का, कलप करै दिल देवा। सुमरन करै सुरति सै लापै, पावै हरि
पद भेवा।।2।। आसन बंध पवन पद परचै, नाभी नाम जगावै। त्रिकुटी कमल में पदम झलकै, जा सें
ध्यान लगावै।।3।। सब सुख भुक्ता जीवत मुक्ता, दुःख दालिद्र दूरी। ज्ञान ध्यान गलतांन हरी पद,
ज्यौं कुरंग कसतूरी।।4।। गज मोती हसती कै मसतगि, उनमन रहै दिवानां। खाय न पीवै मंगल
घूमें, आठ बखत गलतानां।।5।। ऐसैं तत पद के अधिकारी, पलक अलख सें जोरैं। तन मन धन
सब अरपन रहीं, नेक न माथा मोरैं।।6।। बिनहीं रसना नाम चलत है, निरबांनी सें नेहा। गरीबदास
भोडल में दीपक, छांनि नहीं सनेहा।।7।।66।। भक्ति मुक्ति के दाता सतगुरु। भक्ति मुक्ति के
दाता।। टेक।। पिण्ड प्रांन जिन्हि दान दिये हैं, जल सें सिरजे गाता। उस दरगह कूं भूलि गया है,
कुल कुटंब सें राता।।1।। रिधि सिधि कोटि तुरंगम दीन्हें, ऐसा धनी बिधाता। उस समरथ की रीझ
छिपाई, जग से जोर्या नाता।।2।। मुसकल सें आसान किया था, कहां गई वै बाता। सत सुकृत कूं
भूलि गया है, ऊंचा किया न हाथा।।3।। सहंस इकीसौं खंड होत हैं, ज्यौं तरुवर कैं पाता। थूंनी
डिगी थाह कहा पावै, यौह मंदर ढह जाता।।4।। इस देही कूं देवा लोचैं, तूं नरक्यौं उकलाता। नर
देही नारायन येही, सनक सनन्दन साथा।।5।। ब्रह्म महूरति सूरति नगरी, शुन्य सरोवर न्हाता। या
परबी का पार नहीं रे, सकल कर्म कटि जाता।।6।। सुरति निरति मन पवन बंद करि, मेरदण्ड चढि
जाता। सहंस कमल दल फूलि रहै है, अमी महारस खाता।।7।। जहां अलख निरंजन जोगी बैठ्या,
जा सें रह्मा न भाता। गरीबदास पारंग प्रान है, संख कमल खिलि जाता।।8।।75।।






Jagat guru Rampal ji




















राग बसंत से शब्द नं. 8 :-
कोई है रे परले पार का, जो भेद कहै झनकार का।।टेक।। वारिही गोरख वारिही दत, बारिही ध्रू
प्रहलाद अरथ। वारिही सुखदे वारिही ब्यास, वारिही पारासुर प्रकाश।।1।। वारिही दुरबासा दरबेश,
वारिही नारद शारद शेष। वारिही भरथर गोपीचंद, वारिही सनक सनंदन बंध।।2।। वारिही ब्रह्मा
वारिही इन्द, वारिही सहंस कला गोविंद। वारिही शिबशंकर जो सिंभ, वारिही धर्मराय आरंभ।।3।।
वारिही धर्मराय धरधीर, परमधाम पौंहचे कबीर। ऋग यजु साम अथरवन बेद, परमधाम नहीं लह्या
भेद।।4।। अलल पंख अगाध भेव, जैसैं कुंजी सुरति सेव। वार पार थेहा न थाह, गरीबदास निरगुन
निगाह।।5।।8।।
 राग होरी से शब्द नं. 8 :-
अलल का ध्यान धरौ रे, चीन्हौं पुरुष बिदेही।।टेक।। उलटि पवन रेचक करि राखौ, काया कुंभ
भरौ रे। अडिग अमांन अडोल अबोलं, टार्यौ नांहि टरौ रे।।1।। बिन सतगुरु पद दरशत नाहीं, भावै
तिहूं लोक फिरौ रे। गुन इन्द्री का ज्ञान परेरो, जीवत क्यौं न मरौ रे।।2।। पलकौं दा भौंरा पुरुष
बिनांनी, खोटा करत खरौ रे। कामधेनु दूझे कलवारनि, नीझर अजर जरौ रे।।3।। कलविष
कुसमल बंधन टूटैं, सब दुःख ब्याधि हरौ रे। गरीबदास निरभै पद पाया, जम सें नांहि डरौ
रे।।4।।8।।
‘‘सुमिरन के अंग का सारांश’’
संत गरीबदास जी ने अपनी अमृतवाणी रूपी वन में प्रत्येक प्रकार के पेड़-पौधे,
जड़ी-बूटियां, फूल, फलदार वृक्ष, मेवा की लता आदि-आदि उगाए हैं। इसका मुख्य कारण
यह रहा है कि जो मूल ज्ञान है, उसको गुप्त रखना था। यह परमात्मा कबीर जी का आदेश
था। इसी कारण से संत गरीबदास जी ने अनेकों वाणियाँ कही हैं। मन की आदत है कि यदि
कम वाणी हैं तो उनको कण्ठस्थ करके अरूचि करता है। ये ढे़र सारी अमृतवाणी लिखवाकर
संत गरीबदास जी ने मन को व्यस्त तथा रूचि बनाए रखने का मंत्रा बताया है। मन पढ़ता
रहता है या सुनता रहता है, आत्मा आनन्द का अनुभव करती है।
वाणी नं. 18 में कहा है कि :-
गरीब, राम कहा तो क्या हुआ, उर में नहीं यकीन। चोर मुसें घर लूटहि, पाँच पचीसों तीन।।18।।
 भावार्थ :- यदि साधक को परमात्मा पर विश्वास ही नहीं है तो नाम-सुमरण का कोई
लाभ नहीं। उसके मानव जीवन को काम, क्रोध, मोह, लोभ, अहंकार रूपी पाँच चोर मुस
(चुरा) रहे हैं। इन पाँचों की पाँच-पाँच प्रकृति यानि 25 ये तथा रजगुण के आधीन होकर
कोठी-बंगले बनाने में, कभी कार-गाड़ी खरीदने में जीवन नष्ट कर देता है। सतगुण के प्रभाव
से पहले तो किसी पर दया करके बिना सोचे-समझे लाखों रूपये खर्च कर देता है। फिर
उसमें त्राटि देखकर तमोगुण के प्रभाव से झगड़ा कर लेता है। इस प्रकार तीन गुणों के प्रभाव
से मानव जीवन नष्ट हो जाता है। यदि तत्वदर्शी संत से ज्ञान सुनकर विश्वास के साथ नाम
का जाप करे तो जीवन सफल हो जाता है।
जिन-जिन भक्तों ने मर्यादा में रहकर जिस स्तर की भक्ति, दान आदि-आदि किया





कबीर साहिब हर युग में प्रकट होकर अपनी (पूर्ण ब्रह्म) की जानकारी स्वयं बताते हैं कि ब्रह्मा, विष्णु, महेश, ब्रह्म तथा पर ब्रह्म से ऊपर असंख्य भुजा का परमात्मा सतपुरुष (पूर्ण ब्रह्म) है जो सत्यलोक में रहता है। वहाँ पर सत्यनाम-सारनाम के जाप द्वारा जाया जाएगा जो पूरे गुरु से प्राप्त होता है। सतलोक में जो आत्मा चली जाती है उसका पुनर्जन्म नहीं होता।

Jagat guru Rampal ji

Tuesday, June 2, 2020

       कबीर जी की लीलाए

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“कबीर, बेद कतेब झूठे नहीं भाई, झूठे हैं जो समझे नाहिं।”

भावार्थ है कि चारों पवित्रा वेद ऋग्वेद - अथर्ववेद - यजुर्वेद - सामवेद तथा पवित्र चारों कतेब कुरान शरीफ - जबूर - तौरात - इंजिल गलत नहीं हैं। परन्तु जो इनको नहीं समझ पाए वे नादान हैं।

वेदों में पूर्ण परमात्मा का सम्पूर्ण वर्णन है, लेकिन तत्वज्ञान के अभाव से पंडित, ब्राह्मण, ऋषि मुनि समझ नहीं सके।

#कबीर_वाणी





600 वर्ष पूर्व कबीर परमेश्वर ने अपनी वाणियो में सृष्टि रचना का सम्पूर्ण ज्ञान बताया था, उन्होंने बताया की पहले ब्रह्म (काल) की उत्पत्ति अण्डे से हुई। फिर दुर्गा की उत्पत्ति हुई। दुर्गा के रूप पर आसक्त होकर काल ने छेड़-छाड़ की, तब कबीर जी वहाँ गए दुर्गा की रक्षा करी और काल व् दुर्गा को 21 ब्रह्माण्ड समेत 16 शंख कोस की दूरी पर भेज दिया। काल ने दुर्गा के साथ भोग-विलास किया। इन दोनों के संयोग से ब्रह्मा, विष्णु, शिव की उत्पत्ति हुई। इन्हीं तीनों की ही साधना करके सर्व प्राणी काल जाल में फंसे हैं। जब तक सतगुरु नहीं मिलेगा, पूर्ण मोक्ष होना असंभव है।






5 जून 2020 को कबीर प्रकट दिवस है, देखना ना भूले साधना चेनेल पर सुबह 9 से 12 बजे तक अनमोल सत्संग, संत रामपाल जी महाराज जी के मुखारबिंद से।।


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Monday, June 1, 2020

                 कबीर ज्ञान
   रामानंद जी के मन की बात जानना




रामानंद जी प्रतिदिन विष्णु की मानसिक मूर्ति बनाकर कर्म कांड करके पूजा करते थे। एक दिन वे भगवान विष्णु जी को स्नान कराकर मुकुट पहना दिया और गले में कंठी डालना भूल गए। मन ही मन बहुत दुखी हुए की आज पूजा ख़राब होगई।
5 वर्ष के बालक रुप में कबीर साहेब ने उनके मन की बात को जानकर रामानंद जी को कहा कि, स्वामी जी माला की गांठ खोलकर माला पहना दो, फिर गांठ लगा दो।मुकुट नहीं उतारना पड़ेगा।
रामानंद जी के मन की बात जानना
रामानंद जी प्रतिदिन विष्णु की मानसिक मूर्ति बनाकर कर्म कांड करके पूजा करते थे। एक दिन वे भगवान विष्णु जी को स्नान कराकर मुकुट पहना दिया और गले में कंठी डालना भूल गए। मन ही मन बहुत दुखी हुए की आज पूजा ख़राब होगई।
5 वर्ष के बालक रुप में कबीर साहेब ने उनके मन की बात को जानकर रामानंद जी को कहा कि, स्वामी जी माला की गांठ खोलकर माला पहना दो, फिर गांठ लगा दो।मुकुट नहीं उतारना पड़ेगा।




कबीर परमेश्वर को बालक रूप में लहरतारा तालाब पर कमल के फूल से लाकर नीरू तथा नीमा अपने घर जुलाहा मोहल्ला (कॉलोनी) में आए। जिस भी नर व नारी ने नवजात शिशु रूप में परमेश्वर कबीर जी को देखा वह देखता ही रह गया। परमेश्वर का शरीरअति सुन्दर था। आँख जैसे कमल का फूल हो, घुँघराले बाल, लम्बे हाथ। लम्बी-2 अँगुलियाँ शरीर से मानो नूर झलक रहा हो। पूरी काशी नगरी में ऐसा अद्धभुत बालक नहीं था।






600 वर्ष पूर्व कबीर परमेश्वर ने अपनी वाणियो में सृष्टि रचना का सम्पूर्ण ज्ञान बताया था, उन्होंने बताया की पहले ब्रह्म (काल) की उत्पत्ति अण्डे से हुई। फिर दुर्गा की उत्पत्ति हुई। दुर्गा के रूप पर आसक्त होकर काल ने छेड़-छाड़ की, तब कबीर जी वहाँ गए दुर्गा की रक्षा करी और काल व् दुर्गा को 21 ब्रह्माण्ड समेत 16 शंख कोस की दूरी पर भेज दिया। काल ने दुर्गा के साथ भोग-विलास किया। इन दोनों के संयोग से ब्रह्मा, विष्णु, शिव की उत्पत्ति हुई। इन्हीं तीनों की ही साधना करके सर्व प्राणी काल जाल में फंसे हैं। जब तक सतगुरु नहीं मिलेगा, पूर्ण मोक्ष होना असंभव है।



अधिक जानकारी के लिए जरूर सुने संत रामपाल जी महाराज जी के सत्संग हर रोज़ 
साधना चेनेल पर - ::- शाम - 7:30 बजे से





Saturday, May 30, 2020

कबीर, साहेब जी स्वयं भगवान है।।
वेदों में प्रमाण है, कबीर साहेब भगवान है।।,
    

             पूर्ण ब्रह्म कबीर जी""


चार राम की भक्ति में, लग रहा संसार ।
पाँचवे राम का ज्ञान नहीं, जो पार हो उतारणहार।।

#कबीर_वाणी






क्या आकाश का फेर है, क्या धरती का तोल।
क्या संत की महिमा कहुँ, क्या पारस का मोल।।


#कबीर_वाणी









बाइबल वेद कुरान है, जैसे चांद प्रकाश ।
सूरज ज्ञान कबीर का, करें तिमर का नाश।।


#कबीर_वाणी

बोली ठोली मस्खरी, हँसी खेल हराम |

मद माया और इस्तरी, नहि सन्त के काम ||

बोली - ठोली, मस्खरी, हँसी, खेल, मद, माया एवं स्त्री संगत - ये संतों को त्यागने योग्य हैं।।




गरीब, पतिव्रता चुके नहीं, तन मन जाओ सीस।

मोरध्वज अर्पण किया, सिर साटे जगदीश।।

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